अधिगम,थार्नडाइक का संबंधवाद,पावलव का क्लासिकल अनुबंध सिद्धान्त

अधिगम ( Learning )

नविन ज्ञान तथा नविन प्रतिक्रियायों का अर्जन अधिगम कहलाता है — वुडवर्थ

अनुभव तथा प्रशिक्षण के द्वारा व्यवहार का उन्नयन अधिगम है — गेट्स

व्यवहार में उत्तोरोत्तर अनुकूल की प्रक्रिया अधिगम है — स्किनर

आदतों ज्ञान तथा अभिवृत्तियों का अर्जन अधिगम है — क्रो एंड क्रो

व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन अधिगम है — गिल फोर्ट

— अधिगम की विशेषताएं —

 

विकास

समायोजन

अनुभवो का संगठन

सृजनशीलता

सतत एवं जीवन पर्यन्त चंलाने वाली प्रक्रिया

व्यक्तिगत एवं सामाजिक

— अधिगम  प्रमुख विधियां —

करके सीखन

निरिक्षण विधि

परिक्षण विधि

वाद – विवाद विधि

वचन विधि ( इस विधि को सस्वर विधि भी कहते कहते है )

अनुकरण विधि

प्रयास एवं  त्रुटि विधि (इसमें एक ही अधिगम बार बार होता है )

पूर्ण विधि ( इसमें एक अधिगम को पूर्ण करके फिर दोहराते है )

अंश विधि (इसमें  अधिगम को बाँट – बाँट कर पूर्ण करते है )

अंतराल विधि ( इसमें थोड़े थोड़े समय में बार – बार अधिगम होता है )

सतत विधि ( इसमें लगातार अधिगम होता है )

— अधिगम के प्रकार —

मुख्यतः तिने प्रकार का होता है —

1 – गामक अधिगम — इस प्रकार के अधिगम में अंग सञ्चालन तथा गति नियंत्रण की आवश्यकता है।

इस प्रदर के अधिगम शारीरिक कुशलता वाले कार्य किये जाते है।

उदाहरण — देखना, सिर उठाना, चलना आदि।

2 – संवेदनात्मक अधिगम — इस  प्रकार के अधिगम में संवेदनशील क्रियाओ द्वारा अधिगम होता है।  इसमें कौशल वाले कार्य होते है जो की गामक क्रियाओ के प्राक्षिण द्वारा प्राप्त होता है।

उदाहरण — तैरना, टाइपिंग आदि।

3 – ज्ञानात्मक अधिगम — इस अधिगम में बौद्धिक विकास द्वारा अधिगम की पूर्ति होती है जिसको निम्न भागो में बनता गया है।

(i) – प्रत्यक्षात्मक — इसमें देखकर, सुनकर तथा स्पर्श करके अधिगम होता है जो की मुख्या रूप से शैशवास्था व बाल्यावस्था में होता है।

(ii) – प्रत्यात्मक — इसमें अनुभव, तर्क तथा चिंतन के द्वारा किसी ज्ञान की पूर्ति होती है

इसमें बालक अमूर्त अधिगम प्राप्त करता है।

(iii) – शहचर्यात्मक — इसमें अधिगम पूर्ण ज्ञान तथा अनुभव के आपसी में द्वारा होता है जो की एक स्वाभाविक क्रिया माना गया है।

 

— अधिगम सिद्धान्त —

अधिगम सिद्धान्त मुख्यतः दो प्रकार के होते है —

अधिगम संबंधीवादी सिद्धान्त — इस सिद्धान्त उद्दीपक तथा अनुक्रिया के मध्य संबंधी दर्शाते दर्शाते है।  प्रमुख संबंधवादी मनोवैज्ञानिक निम्न है — थार्नडाइक , वुडवर्थ , हल , स्किनर।, पावलव  आदि।

थार्नडाइक का संबंधवाद ( S – R Bond ) — इसे उद्दीपक अनुक्रिया सिद्धान्त भी कहा है —

इसे प्रयास व त्रुटि का सिद्धान्त  कहते है।

इसमें यह बताया गया है की प्रत्येक क्रिया के पीछे एक उद्दीपक होता है।

इसमें  अधिगम को प्रयास एवं त्रुटि का परिणाम मन गया है।

थार्नडाइक  द्वारा बिजली, चूहे, मुर्गियों पर प्रयोग किये गए है।

थार्नडाइक द्वारा इस सिद्धाब्त के द्वारा अधिगम  के निम्न तीन नियम बताये है —

1 . अभ्यास का नियम — इसमें उपयोग तथा अनुप्रयोग पर बल दिया गया है।  जिसमे छात्रों को बार – बार दोहराने पर बल दिया गया है।

2 . प्रभाव का नियम — इसमें सन्तोष  असंतोष द्वारा अधिगम होता है।  इस अधिगम में पुरस्कार व दण्ड का विशेष महत्व है।

3 . तत्परता का नियम — इसमें विशेष करके बालक की स्वमं की उत्सुकता महत्वपूर्ण होती अहि , जिसे तैयारी का नियम भी कहते है।

महत्व —

इस सिद्धान्त से सुधार की विधि का जन्म हुआ है।
इसमें धैर्य तथा परिश्रम के गन का विकास होता है।
इसमें अधिगम एक स्थाई क्रिया होती है।
इस अधिगम का प्रयोग विशेष कर गंभीर विषयो पर अधिक अच्छा माना गया है।
पावलव का क्लासिकल अनुबंध सिद्धान्त या अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त या अनुबंधित अनुक्रिया सिद्धान्त —

इस सिद्धान्त में पावलव द्वारा मानव प्रव्रत्तियों को अनुक्रिया का जिम्मेदार माना गया है।

इस सिद्धान्त में अनुक्रिया के लिए प्राकृतिक उद्दीपक को विशेष माना गया है।  उदाहरण – भूखे व्यक्ति के सामने भोजन आने पर मुह में लार आना।

पावलव द्वारा कुत्ते पर प्रयोग किया गया।

इसमें अनुबंधन के निम्न चार अंग है —

स्वाभविक उद्दीपक
स्वाभाविक अनुक्रिया
अनुबंधित उद्दीपक
अनुबंधित अनुक्रिया

— महत्व — 

इस अधिगम द्वारा बालक की बुरी आदतो का निवारण होता है।
इसके द्वारा अनुशाशन के महत्व को बल दिया गया है।
इसके द्वारा मानसिक विकारो का निदान किया जा सकता है।

NOTE —

इस प्रकार का अधिगम स्थाई नहीं माना गया है।
यह अधिगम केवल स्वाभाविक क्रियाओ पर उपयुक्त माना गया है।
यह अधिगम पशुओ के लिए उपयुक्त माना गया है।